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लेजर तकनीक से समतल होगा खेत, खाद-पानी की होगी बचत और पैदावार भी बंपर

    लेजर तकनीक से समतल होगा खेत, खाद-पानी की होगी बचत और पैदावार भी बंपर

अब जल्द ही लेजर तकनीक के सहारे खेतों को समतल कर खेती की जा सकेगी। बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) ने उबड़-खाबड़ खेतों को समतल करने का वैज्ञानिक व आसान तरीका निकाला है। बीएयू ने किसानों के खेतों में इसका प्रयोग भी शुरू कर दिया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि इस तरीके से जुताई से 40 प्रतिशत पानी और खाद की बचत होती है। साथ ही पैदावार में भी 20 से 25 प्रतिशत का इजाफा होता है। 

कृषि विज्ञान केंद्र सबौर मौसम के अनुकूल खेती के लिए चयनित गांवों में लेजर तकनीक से खेतों को समतल करने के लिए किसानों के बीच जागरूकता अभियान भी चला रहा है। इस तकनीक से सुल्तानगंज, गोराडीह व कहलगांव प्रखंड की 200 एकड़ जमीन को समतल बनाया जा रहा है। बीएयू के निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ. आरके सोहाने ने कहा कि लेजर तकनीक से जमीन को समतल करने से पानी और खाद दोनों की बचत होती है। परंपरागत तरीके से समतल करने में कमियां रह जाती हैं।

 इससे पानी और खाद पौधे तक सही मात्रा में नहीं पहुंच पाता है। जमीन जब समतल होगा, तभी पैदावार भी अच्छी होगी। किसानों को इस तकनीक का इस्तेमाल करना चाहिए। कृषि विज्ञान केंद्र सबौर के वरीय कृषि वैज्ञानिक डॉ. विनोद कुमार ने बताया कि भागलपुर में प्रयोग के तौर पर इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। आगे इस योजना को हर किसान तक पहुंचायी जाएगी। पौधे में सही मात्रा में पानी और खाद का जाना जरूरी होता है। वहीं जमीन की उर्वरा शक्ति भी इससे बढ़ता है। हर किसान को तीन साल में एक बार लेजर तकनीक से जमीन को समतल कराना चाहिए।

एक समान पौधों का विकास
गोराडीह प्रखंड के बरहरी गांव के किसान रंजन कुमार सुमन ने कहा कि जमीन समतल होने से एक समान पौधों में पानी जाने से समान तरीके से फसल बढ़ती है। पटवन भी कम लगता है। किसान राकेश कुमार अभी इस तकनीक के सहारे मूंग की खेती कर रहे हैं। आगे धान की फसल लगानी है। समतल कर शून्य तकनीक से सीधे बुआई की जाती है। कहलगांव प्रखंड के बभनगामा के किसान कृष्ण मोहन ने कहा कि पटवन के समय पूरे खेत में पानी रहता है। बीज एक रंग जाने से पैदावार भी बढ़ने की संभावना अधिक रहता है। 

तीन गुना पानी की होती है बचत 
वरीय कृषि वैज्ञानिक डॉ. विनोद कुमार ने कहा कि उबड़-खाबड़ एक एकड़ जमीन में 18 क्विंटल धान के उत्पादन में 72 लाख लीटर पानी की खपत होती है। वहीं लेजर तकनीक से जमीन को समतल करने के बाद शून्य जुताई तकनीक से खेती करने पर 22 लाख लीटर ही पानी लगता है। इससे तीन गुना पानी की बचत होती है। भूमिगत जल की बचत होगी। पटवन पर अधिक खर्च नहीं आएगा। 

एक एकड़ दो घंटे में समतल 
बीएयू द्वारा यह मशीन कई गांवों में देकर जमीन समतल कराया जा रहा है। वहीं कुछ किसान सरकारी अनुदान पर मशीन खरीदकर इलाके में भाड़ा पर चला रहा है। किसान रंजन ने बताया कि पांच से 10 प्रतिशत उबड़-खाबड़ होने पर 1600 प्रति एकड़ और उससे अधिक होने पर तीन हजार रुपये प्रति एक का खर्च आता है। एक एकड़ को समतल करने में दो घंटे का वक्त लगता है। सामान्य जुताई से इसमें 20 फीसदी खर्च की बचत है।

क्या है लेजर तकनीक
लेजर 800 से लेकर 1500 मीटर के रेंज का होता है। इसे खेत के चारों कोने पर लगाकर जमीन के समतलीकरण की जांच होती है। वहीं ट्रैक्टर के पीछे हाइड्रोलिक सिलेंडर से जुड़ा ब्लेड लगा होता है। इसके ऊपर एक रिसीवर ट्रांसमीटर लगा होता है। इसका कंट्रोल ड्राइवर के बगल में होता है। सिगनल के अनुसार हाइड्रोलिक सिलेंडर से जुड़ा ब्लेड ऊपर नीचे मिट्टी को समतल करता है। ग्रीन सिगनल जलते ही काम बंद हो जाता है।
 
 

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